बारिश आते ही "वो बारिश का पानी" गाना याद आता है,
मौसम मस्त हो जाता है,
सब कुछ सुहावना नजर आता है
लेकिन रह जाता है कीचड़ ।
जी हा कीचड़
सड़को पर,
बगीचो पर,
ट्रेन में,
बस में,
जहा देखो वहा कीचड़,
चारो और कीचड़ ही कीचड़
शादी में कीचड़,
अस्पताल में कीचड़,
रेलवे स्टेशन पर कीचड़,
यहाँ तक की घर के द्वार पर कीचड़.
हर एक फर्श पर कीचड़,
हर एक पत्थर पर कीचड़,
स्ट्रीट लाइट के पोल पर भी कीचड़.
मुझे तो लगा, पानी आया था...
पर दिख तो कीचड़ ही रहा है।
कीचड़ भी कितनी तरह का..
कहीं सड़क पे रुकी हुई खुदाई का कीचड़,
कही मोहल्ले में पड़े कचरे का कीचड़
कही कार पे कीचड़
तो कहीं चेहरों पर उछलता गहराई का कीचड़
हर पल में कीचड़, हर घर मैं कीचड़..
कही बच्चों के मध्य प्यार का कीचड़
तो कही खेतो में है जुताई का कीचड़
मैंने देखा काई का कीचड़
तो किसी के लिए हुआ ये ही लड़ाई का कीचड़।
कीचड़ ही कीचड़, कीचड़ ही कीचड़ .
अंत में बस इतना कहना चाहूंगा,
कि मेने देखा है कमल का कीचड़,
जो कि है एक बेहतरीन कीचड़ ।
- वैभव गादिया "रक्त दान कीजिये, जीवन बचाइये"