Wednesday, May 10, 2017

आज में कुछ खो रहा हूँ - वैभव गादिया


बरसो पुराने उन सपनो को, जो देखे थे नन्ही आँखों से ।
अपनी उन शरारती बातो को जो करते थे ये लब प्यारे से ।
किताबो में खोयी उन नींदों को, उन नाजुक नाजुक से बंधो को,
आज में कुछ खो रहा हूँ , आज में कुछ खो रहा हूँ ।

वो परिंदों से उड़ने की तमन्ना,दिल ये लिया जो चलता था ।
वो कुछ कर गुजरने का होसला, जो हर दिन हम में होता था ।
वो जो लिखते थे हम हर इक पन्ने पे, उन किस्से - कहानियो को भी - आज में कुछ खो रहा हूँ, आज में कुछ खो रहा हूँ।

ना जाने किस ओर जाना है, ना जाने किस ओर बढ़ रहा हूँ।
अपने उन सपनो से परे, इस जिंदगी से में लड़ रहा हु ।
मंजिले मिलेगी मुझे , ये मेरा होसला है ,
कल को कुछ बन पाने के लिए
आज में कुछ खो रहा हूँ , आज में कुछ खो रहा हूँ ।


Vaibhav Gadia "Donate Blood Save Life"

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