Monday, October 30, 2017

तेरे साथ हैं खड़ा ये सारा जहाँ....

यूँ रातो को यह नींद ना आना,
दिल में कुछ बातों को दबाते जाना,
अपनी यह तड़प, किसी को भी न दिखाना,
और खाली रातों मैं यूँ थर थर्राना,
कुछ तो है तेरे मन मैं,
जो हैं तुझे सता रहा,
यूँ ही नहीं होता ये,
रातभर जागने का सिलसिला,
मन मैं जो दबा रखी हैं,
वो बात किसी को तो बता,
दिल ये तेरा आज खाली जो है,
इसको भरने के लिए कदम तो बढा,
तू देखेगा की तू अकेला है नहीं,
तेरे साथ हैं खड़ा ये सारा जहाँ |
तेरे साथ हैं खड़ा ये सारा जहाँ ||

तेरी पहचान खो रही है,
तेरी कला मिट रही है
तू अपने आप को जगा,
दुनिया को कुछ कर के दिखा,
माना हम उस दौर में खड़े है,
जहाँ कुछ भी है नहीं बचा,
पर एक सांज में तू गा जरा,
तू देखेगा की तू अकेला है नहीं,
तेरे साथ हैं खड़ा ये सारा जहाँ |
तेरे साथ हैं खड़ा ये सारा जहाँ ||


- Vaibhav Gadia "Donate Blood Save Life"

Saturday, October 14, 2017

“संघर्ष और सफलता”

वो शुरुवाती दिन आज भी याद आते है
जब शुरू किया था चलना,
लम्हे वो तड़पाते हैं
सब ने अपने अपने मतलब निकाले
भीड़ थी पर में था अकेला
ये था संघर्ष का मोड़ पहला

धीरे धीरे जब में आगे बड़ा
कुछ अपने बेगाने से नजर आये
और कुछ बेगाने दिल को छु पाए
जो थे सच्चे वो जूठे नजर आये
जो थे गहरे उनमे एक बूंद भी ना समां पाए
जिंदगी की असलियत से जब पहचान हुई
यह संघर्ष की कहानी सभी के साथ हुई

कुछ को थी चिंता मेरी , कुछ को भरोसा था
लेकिन सच मायने में , मैं खुद भी अधूरा था
अनजाने से रास्ते थे, मंजिल का ही नहीं था ठिकाना
उठना भी था और लड़ना भी
बिना किसी का बुरा किये था आगे बढना भी
राहो मैं जो पड़ा था कंकर वो था पार कर जाना
यही तो था असली संघर्ष का ज़माना

चेहरे पर सिकन तो थी, आखें ये नरम तो थी
पर दिल में एक जज्बा लिए हम चल पड़े थे
अब तो था बस कुछ करने दिखाना
उन सभी लोगो को भी था चुप करना
जिन्होंने सताया था दे दे कर ताना
आज वो घडी भी यूँ आ गई
चेहरे पर मुस्कान छा गई , दर्द यूँ थर्रा सा गया
जब सफलता कदमो में आ गई, जाब सफलता कदमो में आ गई   


आपका ही..वैभव गादिया 

Monday, September 25, 2017

बीज हूँ साहब, मुझे आदत हैं उग जाने की....


चेहरे पर हमेशा यह मुस्कान रही,
हाथो की लकीरों से ज्यादा, मन मैं मेहनत की कमान रही,
किया है मैंने कई तूफानों का डट के सामना,
मंजिल पर हमेशा पंहुचा है मेरा ये कांरवा,
उन्होंने सोचा था मिटटी में दब जाऊँगा,
दूर कहीं हार के थक जाऊंगा,
पर लौट के हूँ आया, सबके दिलो में हूँ छाया
क्या करू?
बीज हूँ साहब, मुझे आदत हैं उग जाने की |

कई  मुश्किलों का डट के है सामना किया,
कई अल्फाजो पर खुल के हैं जवाब दिया,
राहो के कंकर को हमने पैरो में दबाया है,
दर्द हुआ पर सहन करके, परचम अपना लहराया हैं,
मिटटी मैं दबाने की उनकी हर कोशिश नाकाम हुई ,
लहरों को चीर कर यह नैया हर बार है पार हुई,
क्युकी...
बीज हूँ साहब, मुझे आदत हैं उग जाने की |

चले तो हम कारंवा लेकर ही थे,
कुछ लोगो ने किया यह छल कपट भरा कारनामा हैं,
किया भी सही तो कोई बात नहीं
हमे कहा किसी को निचा दिखाना है,
पर उनकी यह मेहनत भी बेकार हुई,
जब हुआ सवेरा तब एक नयी फसल की सौगात हुई,
यह तो होना ही था..क्युकी
बीज हूँ साहब, मुझे आदत है उग जाने की |


-Vaibhav Gadia "Donate Blood Save Life"


Saturday, September 23, 2017

आज फिर मैंने, कलम को अपने हाथ लिया..

सालो से जो दिल में दबी थी
उस आवाज को सरेआम किया..
हुआ था जो अन्याय उस पर
उसका आज पैगाम दिया..
आज फिर मैंने, कलम को अपने हाथ लिया....
आज फिर मैंने, कलम को अपने हाथ लिया....

कब तक बैठेंगे युही चुप रहके हम,
कब तक सहेंगे अधर्म के कष्टों को |
सही का कोई समय नहीं,
जो करना है आज करो ये जान लिया..
आज फिर मैंने, कलम को अपने हाथ लिया....
आज फिर मैंने, कलम को अपने हाथ लिया....

अगर कुछ बदलना है तो,
करने होंगे हौसले बुलंद
गलत के विरोध में हमने
कलम की ताक़त का शुरू उपयोग किया..
आज फिर मैंने, कलम को अपने हाथ लिया....
आज फिर मैंने, कलम को अपने हाथ लिया....

बदल के दिखाऊंगा,
मैं इस दुनिया को अब
चाहे कितनी ही मुश्किलें से हो सामना,
आज मैंने है ये ठान लिया..
आज फिर मैंने, कलम को अपने हाथ लिया....
आज फिर मैंने, कलम को अपने हाथ लिया....

Vaibhav Gadia "Donate Blood Save Life"

Saturday, August 19, 2017

Kuch pal...

Kuch pal aapko ye ahsas karate hai,
ki jeevan kya hai, kaisa hai, kyu hai..
Bas unhi shabdo ko dhundhti hai ye parchaai, Umra Bhar.



Vaibhav Gadia "Donate Blood Save Life"

Monday, July 31, 2017

कुछ पुराने रिश्तों से...…

कुछ पुराने रिश्तों से, मुलाकात नहीं हो पा रही ।
दिल में बसे हैं वो, पर बात नहीं हो पा रही।
इसका मतलब यह नहीं, की उन्हें भूल गया हूँ में।
बस व्यस्त हूँ कुछ बन पाने को ।

Vaibhav Gadia "Donate Blood Save Life"

Wednesday, July 5, 2017

कीचड़... एक व्यंग्य !!!

बारिश आते ही "वो बारिश का पानी" गाना याद आता है,
मौसम मस्त हो जाता है,
सब कुछ सुहावना नजर आता है
लेकिन रह जाता है कीचड़ ।

जी हा कीचड़
सड़को पर,
बगीचो पर,
ट्रेन में,
बस में,
जहा देखो वहा कीचड़,
चारो और कीचड़ ही कीचड़

शादी में कीचड़,
अस्पताल में कीचड़,
रेलवे स्टेशन पर कीचड़,
यहाँ तक की घर के द्वार पर कीचड़.
हर एक फर्श पर कीचड़,
हर एक पत्थर पर कीचड़,
स्ट्रीट लाइट के पोल पर भी कीचड़.

मुझे तो लगा, पानी आया था...
पर दिख तो कीचड़ ही रहा है।

कीचड़ भी कितनी तरह का..
कहीं सड़क पे रुकी हुई खुदाई का कीचड़,
कही मोहल्ले में पड़े कचरे का कीचड़
कही कार पे कीचड़
तो कहीं चेहरों पर उछलता गहराई का कीचड़
हर पल में कीचड़, हर घर मैं कीचड़..

कही बच्चों के मध्य प्यार का कीचड़
तो कही खेतो में है जुताई का कीचड़
मैंने देखा काई का कीचड़
तो किसी के लिए हुआ ये ही लड़ाई का कीचड़।

कीचड़ ही कीचड़, कीचड़ ही कीचड़ .
अंत में बस इतना कहना चाहूंगा,
कि मेने देखा है कमल का कीचड़,
जो कि है एक बेहतरीन कीचड़ ।

- वैभव गादिया "रक्त दान कीजिये, जीवन बचाइये"