वो शुरुवाती दिन आज भी याद आते है
जब शुरू किया था चलना,
लम्हे वो तड़पाते हैं
सब ने अपने अपने मतलब निकाले
भीड़ थी पर में था अकेला
ये था संघर्ष का मोड़ पहला
धीरे धीरे जब में आगे बड़ा
कुछ अपने बेगाने से नजर आये
और कुछ बेगाने दिल को छु पाए
जो थे सच्चे वो जूठे नजर आये
जो थे गहरे उनमे एक बूंद भी ना समां पाए
जिंदगी की असलियत से जब पहचान हुई
यह संघर्ष की कहानी सभी के साथ हुई
कुछ को थी चिंता मेरी , कुछ को भरोसा था
लेकिन सच मायने में , मैं खुद भी अधूरा था
अनजाने से रास्ते थे, मंजिल का ही नहीं था ठिकाना
उठना भी था और लड़ना भी
बिना किसी का बुरा किये था आगे बढना भी
राहो मैं जो पड़ा था कंकर वो था पार कर जाना
यही तो था असली संघर्ष का ज़माना
चेहरे पर सिकन तो थी, आखें ये नरम तो थी
पर दिल में एक जज्बा लिए हम चल पड़े थे
अब तो था बस कुछ करने दिखाना
उन सभी लोगो को भी था चुप करना
जिन्होंने सताया था दे दे कर ताना
आज वो घडी भी यूँ आ गई
चेहरे पर मुस्कान छा गई , दर्द यूँ थर्रा सा गया
जब सफलता कदमो में आ गई, जाब सफलता कदमो में आ गई
आपका ही..वैभव गादिया
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